कैसे शासन करें” बनाम “शासन कौन करे”: आदिनाथ तीर्थंकर की वैश्विक जैन राजनीति और असंख्य काल का प्रभाव
“कैसे शासन करें” बनाम “शासन कौन करे”: आदिनाथ तीर्थंकर की वैश्विक जैन राजनीति और असंख्य काल का प्रभाव
जैन तीर्थंकरों के अनुसार जैन कानून: आदिनाथ तीर्थंकर (ऋषभनाथ) से गहरा संबंध – असि, मासि, कृषि और दंड व्यवस्था
Antiquity In Politics
आदिनाथ तीर्थंकर (ऋषभनाथ) – प्रथम तीर्थंकर और सभ्यता के संस्थापक
जैन परंपरा के अनुसार, 24 तीर्थंकरों में आदिनाथ (ऋषभनाथ) पहले तीर्थंकर थे। वे अयोध्या में हुए और लाखों वर्ष पहले इस युग में जैन धर्म की नींव रखी। स्वर्ण युग (सुख काल) के बाद जब मनुष्य आत्मनिर्भर नहीं रह सके, तब उन्होंने कर्म भूमि (कार्य का युग) की शुरुआत की।
वे सभ्यता के पहले राजा, पहले विधायक और समाज व्यवस्था के संस्थापक माने जाते हैं। उनके पुत्र भारत प्रथम चक्रवर्ती सम्राट बने (भारतवर्ष का नाम उन्हीं से पड़ा)। आदिनाथ ने समाज को संगठित करने के लिए छह मुख्य व्यवसाय सिखाए:
असि (Asi) – तलवारबाजी / सैन्य सुरक्षा / रक्षा व्यवस्था (योद्धाओं का वर्ग)
मासि (Masi) – लेखन / स्याही / प्रशासन / लेखन कला (लेखकों, प्रशासकों का वर्ग)
कृषि (Krishi) – खेती / कृषि / पशुपालन (किसानों का वर्ग)
विद्या (Vidya) – ज्ञान / शिक्षा
वाणिज्य (Vanijya) – व्यापार / वाणिज्य
शिल्प (Shilp) – कला / शिल्प / हस्तकला
असि-मासि-कृषि इन तीनों को विशेष महत्व दिया जाता है क्योंकि ये सुरक्षा, प्रशासन और आर्थिक आधार हैं। इससे पहले समाज बिना व्यवसाय के था। आदिनाथ ने पहला राज्य, पहला कानून, पहला न्यायालय और पहली सामाजिक विभाजन (व्यवसाय आधारित, जन्म आधारित नहीं) स्थापित किया। यह प्राचीन राजनीति की नींव थी – ठीक जैसे यूनानी-रोमनों ने शासन शब्दावली दी, वैसे ही आदिनाथ ने व्यवहारिक समाज-राजनीति दी।
जैन कानून (धर्म शासन) – तीर्थंकरों की शिक्षाएं
जैन कानून अहिंसा (non-violence) पर आधारित है। तीर्थंकरों ने राजाओं के लिए धर्म आधारित शासन के नियम बताए। मुख्य सिद्धांत:
राजा का कर्तव्य: प्रजा की रक्षा, निर्दोषों का संरक्षण, दुष्टों का दमन (लेकिन न्यूनतम हिंसा से)।
कानून कर्म सिद्धांत पर टिका: दंड आत्मा को प्रभावित करता है, इसलिए दंड सुधारात्मक (reformative) और निवारक (deterrent) होना चाहिए, न कि प्रतिशोधी।
अहिंसा का पालन: आदर्श जैन राज्य में मृत्युदंड नहीं होता। दंड के रूप:
जुर्माना (अर्थदंड)
निर्वासन / बंधन
पश्चात्ताप / उपवास / तप (आत्म शुद्धि)
शिक्षा और सुधार (अपराधी को जैन सिद्धांत सिखाना)
गंभीर मामलों में असि (सैन्य शक्ति) का उपयोग, लेकिन केवल रक्षा के लिए।
जैन ग्रंथों (आदिपुराण, त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित्र) में कहा गया है कि दंड “पापों को रोकने” के लिए है। राजा को सुदर्शन चक्र (न्याय चक्र) से शासन करना चाहिए। चंद्रगुप्त मौर्य (जैन भिक्षु बने) जैसे जैन राजाओं ने इसी व्यवस्था का पालन किया।
आधुनिक राजनीति से गहरा संबंध
व्यवसाय विभाजन: आज का “Profession-based society” (किसान, सैनिक, प्रशासक, व्यापारी) आदिनाथ की असि-मासि-कृषि से सीधा जुड़ा है।
अहिंसा आधारित कानून: गांधीजी ने जैन अहिंसा से प्रेरणा ली। भारतीय संविधान में “non-violence” और सुधारात्मक न्याय (rehabilitation) का तत्व इसी से आया।
राजनीतिक नैतिकता: आज के “ethical governance”, “rule of law” और “minimum force” के सिद्धांत जैन तीर्थंकरों के समान हैं।
दंड व्यवस्था: आधुनिक भारत में मृत्युदंड पर बहस और “prison reform” जैन दंड प्रणाली की याद दिलाते हैं – दंड आत्मा सुधार के लिए, न कि बदला।
निष्कर्ष (वैश्विक परिप्रेक्ष्य):
जैन तीर्थंकरों की राजनीति समान रूप से शक्तिशाली वैश्विक प्राचीन धारा है।
आदिनाथ ने मानव सभ्यता के प्रारंभ में “कैसे शासन करें” (अहिंसा + असि-मासि-कृषि आधारित व्यवसाय + सुधारात्मक न्याय) का सार्वभौमिक ढांचा दिया था।
आदिनाथ के बाद असंख्य काल बीतने के पश्चात्, जब समय और युग परिवर्तित हो गए, तब यूनानी और रोमन सभ्यताएँ भी — जिनके पूर्वज आदिनाथ की ही राजनीति करते थे — काल की वजह से अब थोड़े अलग रुख से चल रहे हैं। उनकी वह पद्धति जो प्रारंभ में आदिनाथ से चली आ रही थी, अब पूरी तरह बदल चुकी है। काल के प्रभाव से उन्होंने प्रश्न ही बदल दिया। जहां यूनानी-रोमनों ने “शासन कौन करे” का प्रश्न उठाया, वहीं आदिनाथ ने “कैसे शासन करें” का नैतिक और व्यवहारिक ढांचा प्रस्तुत किया था।
और शायद जब तीर्थंकर फिर प्रकट होंगे, तब अच्छा समय आएगा और पुरानी सोच का फिर से आघाज होगा।
यह वैश्विक दर्शन आज भी विश्व राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार और नैतिक शासन में जीवित है — पूरी मानवता के लिए।
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