Socials

Atulya Nayan of Jainism (ANOJ)

s

Author: SHAH SURIL ATULKUMAR

  अनुच्छेद 21 के ‘भाव’ (Spirit) को जैन न्यायशास्त्र के ‘प्राण-रक्षा’ सिद्धांत से जोड़कर एक अनुपम संगम प्रस्तुत किया है। यह न केवल भारतीय संविधान को जैन न्यायशास्त्र की रोशनी में देखने का नया द्वार खोलता है, बल्कि तीर्थंकरों की अमर शिक्षाओं को आधुनिक न्याय-व्यवस्था से जोड़ता

युगादि: आदिनाथ से मानव सभ्यता का उदय और वैश्विक नववर्ष परंपरा प्रस्तावना युगादि (उगादी) केवल एक तिथि या नववर्ष का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के जागरण, व्यवस्था और चेतना के आरंभ का प्रतीक है। जैन दर्शन के अनुसार इस “युग” की शुरुआत प्रथम तीर्थंकर भगवान

“कैसे शासन करें” बनाम “शासन कौन करे”: आदिनाथ तीर्थंकर की वैश्विक जैन राजनीति और असंख्य काल का प्रभाव जैन तीर्थंकरों के अनुसार जैन कानून: आदिनाथ तीर्थंकर (ऋषभनाथ) से गहरा संबंध – असि, मासि, कृषि और दंड व्यवस्था Antiquity In Politics आदिनाथ तीर्थंकर (ऋषभनाथ) – प्रथम तीर्थंकर और सभ्यता के

यह 'अतुल्य नयन ऑफ जैनिज्म' (Atulya Nayan of Jainism) के लिए तैयार किया गया पूर्ण शोध-आधारित लेख है, जिसमें ऐतिहासिक संदर्भों और साक्ष्यों (Citations) को विधिवत जोड़ा गया है: जैन धर्म: एक अखंड वैश्विक सभ्यता और विश्व शांति का आधार आज का विश्व जिसे हम यूरोप, अमेरिका और

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipisicing elit sed.

Follow us on