ANOJ with थॉमस, ई. (1877). Jainism; or, the Early Faith of Asoka
यह ‘अतुल्य नयन ऑफ जैनिज्म’ (Atulya Nayan of Jainism) के लिए तैयार किया गया पूर्ण शोध-आधारित लेख है, जिसमें ऐतिहासिक संदर्भों और साक्ष्यों (Citations) को विधिवत जोड़ा गया है:
जैन धर्म: एक अखंड वैश्विक सभ्यता और विश्व शांति का आधार
आज का विश्व जिसे हम यूरोप, अमेरिका और विभिन्न महाद्वीपों (खंडों) में विभाजित देखते हैं, वह वास्तव में प्राचीन जैन सभ्यता के पदचिह्नों से आलोकित है। ‘अतुल्य नयन ऑफ जैनिज्म’ का यह मिशन है कि हम समय की धूल में दबी उन कड़ियों को उजागर करें जो सिद्ध करती हैं कि जैन धर्म केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि एक ‘ग्लोबल’ सत्य है।
1. वैश्विक खंडों में जैन सभ्यता के अवशेष
इतिहास केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं है। विश्व के विभिन्न कोनों में ऐसी प्राचीन संस्कृतियां रही हैं जिनके दर्शन में जैन धर्म की स्पष्ट झलक मिलती है।
* यूरोप और अमेरिका की प्राचीनता: इन महाद्वीपों की पुरानी सभ्यताओं में अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद के जो सिद्धांत मिलते हैं, वे मूल रूप से जैन सभ्यता के वैश्विक विस्तार का प्रमाण हैं। हम आने वाले समय में इन क्षेत्रों के पुरातात्विक साक्ष्यों को दुनिया के सामने लाएंगे।
* ऐतिहासिक साक्ष्य (ई. थॉमस, 1877): सुप्रसिद्ध शोधकर्ता ई. थॉमस ने 19वीं सदी में ही यह प्रतिपादित किया था कि जैन धर्म, बौद्ध धर्म से कहीं अधिक प्राचीन है। उन्होंने माना कि वैश्विक धार्मिक कला में जो प्रतीक मिलते हैं, वे वास्तव में जैन ‘प्रोटोटाइप’ (मूल रूप) से लिए गए हैं।
2. सम्राट अशोक और जैन धर्म का प्रारंभिक प्रभाव
अक्सर इतिहास में सम्राट अशोक को केवल बौद्ध धर्म से जोड़ा जाता है, लेकिन ई. थॉमस का शोध एक अलग सत्य उजागर करता है:
* अशोक की प्रारंभिक आस्था: थॉमस के अनुसार, अशोक बौद्ध बनने से पहले एक जैन थे। उन्हें “भारत का कॉन्स्टेंटाइन” कहा जाता है, जिन्होंने अपने शासन के शुरुआती दौर में जैन सिद्धांतों का पालन किया।
* पारिवारिक विरासत: अशोक के दादा, चंद्रगुप्त मौर्य (Sandracottus), स्वयं जैन धर्म के अनुयायी थे, जिसका समर्थन मेगस्थनीज जैसे विदेशी यात्रियों के विवरणों से भी होता है।
* उपाधियाँ और शिलालेख: अशोक की प्रसिद्ध उपाधि ‘देवानंपिय’ (Devånampiya – देवताओं का प्रिय) को मूल रूप से एक जैन उपाधि माना गया है। बौद्ध धर्म के ‘नास्तिक’ दर्शन (जो किसी ईश्वर को नहीं मानता) के कारण बाद में इस उपाधि को अनुपयुक्त मानकर छोड़ दिया गया।
ORIGINAL ARTICLE 1877 NATURE JAINISM

3. श्वेतांबर मार्ग और मूर्तिकला का वैश्विक सत्य
* एशियाई विस्तार: थाईलैंड, इंडोनेशिया और पश्चिम एशिया में मिलने वाली ‘वस्त्र वाली मूर्तियाँ’ जैन श्वेतांबर परंपरा की प्राचीन वैश्विक उपस्थिति का जीवंत प्रमाण हैं।
* धार्मिक संक्रमण और आराधना: राज्यों के आपसी संघर्ष और साम्राज्य विस्तार के कारण, कई मूल जैन श्वेतांबर प्रतिमाओं को बाद में बौद्ध परंपराओं ने अपना लिया। ई. थॉमस ने मथुरा की खोजों का हवाला देते हुए बताया कि कैसे जैन प्रतीकों के आधार पर अन्य संप्रदायों ने अपनी कला विकसित की।
4. तीर्थंकर: विश्व शांति के लिए अटूट विश्वास (Declaration of Faith)
तीर्थंकर केवल एक धर्म के गुरु नहीं हैं; वे संपूर्ण मानवता के कल्याण के मार्गदर्शक हैं।
* शांति का एकमात्र द्वार: तीर्थंकरों का ‘जियो और जीने दो’ का दर्शन ही आज के अशांत विश्व को स्थायी शांति की ओर ले जा सकता है।
* वैश्विक व्यवस्था: बौद्ध ग्रंथों (जैसे महावंश) में वर्णित “24 सर्वोच्च बुद्धों” का संदर्भ सीधे तौर पर जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की शाश्वत व्यवस्था का प्रतिरूप है। यह इस बात का प्रमाण है कि तीर्थंकर पद की महत्ता हर काल और हर खंड में स्वीकार की गई है।
निष्कर्ष
‘अतुल्य नयन ऑफ जैनिज्म’ यह घोषित करता है कि जिसे आज हम अलग-अलग धर्म या संस्कृतियाँ कहते हैं, उनकी जड़ें एक ही वैश्विक जैन सभ्यता में निहित हैं। चाहे वह यूरोप हो या अमेरिका, हम हर खंड में दबे हुए इस सत्य को उजागर करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
“तीर्थंकर का मार्ग ही विश्व शांति का एकमात्र और शाश्वत द्वार है।”
संदर्भ (References):
थॉमस, ई. (1877). Jainism; or, the Early Faith of Asoka. लंदन: ट्रुबनेर एंड कंपनी।
Nature जर्नल, अंक 16 अगस्त, 1877
